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محمد جاوید انور کے افسانہ” نارسائی” کے” ہندی” اور “انگریزی”زبان میں‌تراجم

جاوید انور صاحب عصر حاضر کے افسانہ نگاروں میں معتبر نام ہیں ۔انکے افسانے “نارسائ “کا ہندی ترجمہ حاضر ہے ۔

पहुंच से परे
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कहानी : पहुँच से परे
कथाकार: जावेद अनवर, पाकिस्तान
अनुवाद : सदफ इक़बाल, एम् के बजाज
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मेरे भारी जूते बसन्त के सूखे पत्तों की विद्रोही आवाज़ों से अनजान, उन्हें रौंदते चले जा रहे थे. मेरी दशा से बेपरवाह डूबता सूरज नारंगी क्षितिज पर डूबने से पूर्व अंतिम रंग बिखेरने में मग्न था.
मैं पीली होती घास के बीच लेटी धूल लिपटी पगडण्डी पर खुद को घसीटता उसके क़रीब होता जा रहा था.
काली रेशमी ज़ुल्फ़ों की झालर से चाँद सा मुखड़ा प्रज्वलित हो रहा था.
उदासी ने चारों ओर डेरे डाल रखे थे और वातावरण दुःखमयी था.
वही चौकोर बेंच उधर भी , झुके हुए घने पेड़ के नीचे.
अचंभित करने वाली बात थी .
न वह चौंकी न मेरी ओर आकर्षित हुई।
यह नामुमकिन था कि उसने मेरा वहां आना महसूस न किया हो. वह हमेशा, देखे बिना मुझे पहचान लिया करती थी. उसी के बुलावे पर तो मैं आया था. उसी की मुहब्बत में गिरफ्तार , जादू में जकड़ा, जल्दी जल्दी इस जादू भरे स्थान पर आ गया था. फिर यह घमंड, यह बे-नियाज़ी और उपेक्षा भाव ?
कोई जीवित आत्मा नहीं थी इस फैले हुए खौफनाक जंगल में. केवल हम दो थे और अंतहीन फैलाव को दर्शाने वाली गहरी ख़ामोशी.
ऐसी चुप्पी जो हमें आत्मसात कर स्वयं में समा लेने में सक्षम थी.
ब्रह्माण्ड ठहरा हुआ, समय खामोश. आसमान झुका हुआ, आकर्षित , समय और संसार बेआवाज़ और आश्चर्यचकित.
चारों और गहरी , गंभीर ख़ामोशी.
मेरा अस्तित्व उस तयशुदा कैनवास में महत्वहीन व बेमानी था या शायद वह अनजान थी.
अपनी सोचों के भवँर में डूबती उभरती.
अपने ही अस्तित्व से जूझती.
फिर एक ज़माने के बाद ख़ामोशी में लहर उत्पन्न हुई. वातावरण गुनगुना उठा.
“आखिर तुम पहुंच ही गए यहाँ ?”
उसने मेरी ओर देखे बिना कहा.
उसे पता चल चुका कि मैं भटकता भटकता , सदियों के चक्र का क़ैदी , उसके ग्रह पर आ पहुंचा था. उसके साथ धीरे से चौकोर बेंच पर बैठ चुका था. बिलकुल वैसे जैसे कभी हम बैठा करते थे.
बहुत देर तक हम दोनों चुप रहे.
पेड़ों के साये लम्बे होकर तीसरे पहर को संध्या में परिवर्तित कर रहे थे.
“यह लॉरेंस गार्डन तो नहीं है न , जहाँ हम ने सफ़ेद चादर बिछा कर जनवरी की धूप खाई थी.” सहसा उसकी सरसराती , अजनबी आवाज़ ने मेरे कानों पर दस्तक दी.
“याद है तुम्हे, हमारे सर छू रहे थे. तुम्हारी बातें मेरे कान में गुदगुदी करती थी. तुम बोलते ही जा रहे थे. कभी कथा कभी कविता. क्या संगीत था तुम्हारी बातों में?
ठहर ठहर कर साफ़ और स्पष्ट शब्द , किस रवानी से फिसलते जाते थे तुम्हारे तराशे हुए होठों से.
क्या गुनगुना रहे थे तुम ?
उसने यह सारी बातें एक भावहीन, सर्द और सपाट अंदाज़ में कर दीं.
जैसे कोई रोबोट.
उस बातचीत का टेक्स्ट, पैटर्न और अभिव्यक्ति एक दूसरे से भिन्न थे।
और वह रात भी याद होगी.
कितनी तेज़ बारिश हो रही थी बाहर. तेज़ हवा भी कभी कभी दरवाज़ों और खिड़कियों को बजा कर अपनी मौजूदगी का अहसास करा रही थी।
रात का पिछला पहर.
और तुमने अपनी सारी कविता सारे गीत मुझे सुना डाले. मेरे दिल को एक धक्का सा लगा.
वह जादूभरी भीगी रात मेरी यादों की खिड़की के रास्ते सीधे मेरी आत्मा में उतर गई.
मैं भला क्या जवाब देता?
मैं मिलन के ख़यालों का बंदी.
होश में था कि नहीं कुछ ठीक से याद नहीं.
पूरी तरह से उसके क़ैद में , उसकी पहुँच में था. मुझे बेबसी का अहसास हुआ. मेरी आँखें भीग गईं.
तीव्र इच्छा हुई कि उसे सीने से लगा कर भींच लूँ. बहुत ज़ोर से.
इतना ज़ोर से कि वह मुझ में विलीन हो जाये और हम एक अस्तित्व में परिवर्तित हो जाएँ।
जो एक अस्तित्व निर्मित हो वह उसका हो या मेरा , यह मेरे लिए बिलकुल महत्वपूर्ण नहीं था.
केवल वही एक बदन हम दोनों में हो.
ख़ामोशी का एक अंतराल आया.
फिर मैंने अपनी आवाज़ सुनी.
“जो तुम कहा करती थीं कि मुहब्बत रोना ही रोना है. मुझे बहुत देर बाद तुम्हारी इस बात की समझ आई.
यह स्वीकारोक्ति थी. संभवतः बहुत देर से की गई अभिव्यक्ति भी.
मैं कुछ और भी कहना चाहता था लेकिन उसकी रहस्यमय गंभीरता ने मेरी हिम्मत छीन ली.
“किधर आ निकले हो तुम ?”
“इतनी सदियों बाद। ”
उसकी गुनगुनाती आवाज़ सरसरा गई.
वह बोलने में विशिष्ट “न” की ध्वनि से हट कर प्रभाव दे रही थी. मुझे उसके स्वर में घुली उदासी और शिकायत बुरी लगी.
मेरा कलेजा कट कर रह गया.
“मैं अपना सवाल और एक चौथाई संसार का बोझ उठाये तुम्हे ढूंढता फिर रहा हूँ. हज़ारों साल. करोड़ों मील. हरेक संख्या से परे.
तुम्ही ने तो कहा था कि आना मेरे पास.
सो अब आया हूँ. तेरी आज्ञा का पाबंद.
तेरी चाहत का क़ैदी.”

उसकी उपेक्षा में जाहिर तौर पर कोई अंतर नहीं आया.
वह कहीं और ही खोई रही और एक अंतराल के बाद सरसराती आवाज़ में बोलने लगी.
“तो मैं कहाँ थी ?
मैं तो कहीं भी नहीं गई.
मैंने कहा तो था कि मुझे कहाँ जाना है?
हमेशा और हर लड़ाई के बाद,
जब तुम पछताते थे और फिर अपनी चाहत से हार कर मुझे ढूंढ़ने , मनाने निकलते थे. शर्मिंदा से.
तो क्या कहती थी मैं ?
यही न कि मुझे कहाँ जाना है ? तुम से तो कभी झूठ बोल ही नहीं सकी. गई नहीं कहीं. यहीं मंडराती रही तुम्हारे आस पास .”
मुझे लगा कि मेरी आंखें फिर भर आई हैं.
मर्द होकर इतना तरल दिल का होना ठीक नहीं. लेकिन सब कुछ अपने बस में थोड़े होता है.
उसके शब्द बहरहाल आशा के कई दरवाज़े भी खोल गए.
मुझे स्वयं को संभल कर बोलना पड़ा.
“तो कहाँ गई थी फिर ?
क्यों गई थी ?
यह सोचे बिना कि मेरा क्या होगा ?
क्यों इतना बेबस किया ?
यह जान कर भी कि जियूँगा तो भी ज़िंदगी मौत से बदतर होगी ?
अगर मैं भटकता हुआ अगर इधर न आ निकलता तो सदियों भटकता ही रह जाता. आवारा. गंतव्यहीन.”

उसकी किसी हरकत , किसी इशारे से यह आभास नहीं हुआ कि वह कुछ पिघली है. पसीजी है.
एक हृदयहीन. स्वचालित, मैकेनिकल अंदाज़. वह सब तरह कि सकारात्मक बातें करती चली जा रही थी और मेरे शोकगीत भी सुन रही थी. मैं आश्चर्यचकित था कि शब्द और वाक्य इस नाज़ुक व्यक्तित्व पर कैसे प्रभावहीन हैं?
एक बोझिल अंतराल के बाद मुझे उसकी आवाज़ सुनाई दी.
“हमारी आख़िरी बात तो याद होगी न तुम्हे ?”
मैं थोड़ा घबराया और सोच में पड़ गया.
फिर उसकी मदद चाही.
“कौन सी आख़िरी बात ?
भला बात भी आख़िरी होती है अगर दिल की बात हो ?”
उसने पहली बार मेरी ओर गर्दन घुमाई.
उसकी आँखों में अजब शांति हिलकोरे ले रही थी. बदन और अंग अंग जैसे मस्ती और सुरूर से भरा हुआ हो. और आँखे भी इसी जज़्बे की आधीन.
उदास सी पहचान की लौ उभरी लेकिन समग्र भाव बेपरवाही और बेगरज़ी का ही उभरा.
शब्द जैसे मेरे गले में फँस कर रह गए.
ज़रा सा रुक कर मैं ने हिम्मत बटोरी और फिर बोल पड़ा.
“माफ कर दो मुझे. तुम्हारे दर्शन तब न समझ सका कभी तो अब क्या समझूंगा ?”
उसने नज़रें फिर क्षितिज पर गड़ा लीं और खोई हुई सी धीरे से बोली –
“अगर सचमुच समझना चाहते हो तो मैं मदद करूँ ?
क्या कहना है ? क्या समझना है ?
खून होते अरमानों का शोकगीत ?
टूटे हुए स्वप्नों की किर्चियाँ ?
बिखरे हुए सपने ?
खुदा के लिए सस्ती रुमानी बातें न शुरू कर देना.”
मुझे लगा कि मेरी रूमानी उदासी के चिन्ह उसके मस्तिष्क के अँधेरे कोनों में अब तक सुरक्षित पड़े थे.
शाम के आने से पूर्व वापसी को लालायित परिंदों के झुण्ड ऊंचे पेड़ों की ओर उड़ते हुए नज़र आये.
उनकी चह्कार में उम्मीद से अधिक चिंता की मायूसी महसूस हुई. परिंदों की उड़ान भी सुस्त सी थी.
“अच्छा आज यह तो बता दो कि वह प्यार था कि ज़रुरत ?”
मैं मौक़ा ग़नीमत जान कर फिर बोलने लगा.
यह कई बार का पूछा सवाल था.
अब तक किसी उत्तर की प्यास से वंचित.
“उफ़”
वह बस इतना ही बोली.
मैं ने फिर पूछा ,
“अच्छा, खैर सुनो तो.
वह लाइब्रेरी में किताबों से भरी बड़ी बड़ी अलमारियों के बीच तंग, हलके अँधेरे कोने में जब मैं ने पहली बार तुम्हारे कंधे पर हाथ रखा था. एक कंपकपी सी तुम्हारे अनछुए ,पारदर्शी , महकते बदन से निकल कर मेरी हथेली से गुज़र गई थी.
हर छिद्र को महका गई थी. थरथरा गई थी.
उस कुंवारी कम्पन के अर्थ खोल दो.”
उंसने गर्दन को हल्के से घुमा कर दुखी नज़रों से मुझे देखा ,
“तुम अभी भी उसी रोमांस में फंसे बेवक़ूफ़ हो” . मैं भी विषय बदलने वाला नहीं था.
“वह कम्पन , वह महकती , पवित्र कपकपी तुम्हारे बदन से फैली थी. मेरे बदन ने तो महसूस की थी. भीग गया था उस रमणीयता में.
उसका निशाना था. उत्पत्ति नहीं। ”
मैं पूर्णतः प्रश्न बन गया. जैसे जवाब पर ही मेरी मुक्ति निर्भर थी. मगर जवाब तो उसी को देना था अगर वह चाहती.
मद्धिम स्वर में बोली –
“कोई जवाब नहीं.
ऐसे सवालों का जवाब कभी दिया है मैंने ?
क्या वही आश्चर्य का जादुई लम्हा है तुम्हारे जीवन में, जो भुलाये नहीं भूलता ?”
मुझे जवाब की तलाश में कोई झिझक नहीं हुई.
जैसे सोचने की भी ज़रुरत नहीं हो. जवाब सामने खड़ा हो.
“अरे नहीं. सबसे तृप्ति वाला, शांति देने वाला जादुई लम्हा तो वह था जब तुम उस रात निढाल होकर मेरे सीने पर सर रख कर गहरी नींद सो गई.
इतनी मस्त, कि हलके हलके खर्राटे ले रही थी।
जबकि तुम खर्राटे नहीं लेती।
मैं सोया थोड़े था.
मैं तो मदहोश था.
तृप्त
अधखुले आँखों के दरीचे से चिपका , तेरी दीद के नशे में मस्त. तेरी तृप्ति मेरी रगों में दाखिल हो रही थी और मैं मदहोश.
मैं तो बस तुम्हे देखता रहा जब तक तुम जाग न गयी.”
मुझे लगा इस बात ने उसे भी झिंझोड़ दिया है. जैसे वह भी इस सांझे पल की तलाश में निकल गई है. जो जीवन की पूँजी है.
फिर सम्भली और बोली –
“अरे बस करो. यादों को यादें ही रहने दो.
इन्ही कुछ बेबस लम्हों ने ज़िन्दगी को कुछ अर्थ दिए. वरना मुझे तो तुम जानते हो.
ठंडी और संतुष्ट. निस्वार्थ. अपनी बोलो.
किस लिए ढूँढ़ते रहे ? मुझे हासिल न कर सकना तुम्हारी तक़दीर तो नहीं थी.
क्या गुम कर बैठे ? क्या खो गया ?
भरे पड़े थे. हर चीज़ उपलब्ध.
फिर क्यों फ़कीर बने फिरते थे ?
क्यों भिखारी बने फिरते हो ? भटकते, अभी तक. क्या चाहिए तुम्हे शहज़ादे ?
क्या कमी रह गई कहीं ? मर्ज़ी के मालिक !”

आख़िरकार, उसका प्रिय विषय छिड़ गया.
इस विषय पर बोलते समय हमेशा उसके लहजे में प्यार के साथ तंज़ शामिल हो जाता था.
जवाब तो था मेरे पास.
इतना स्पष्ट हो चुका था कि संभवतः पहले कभी न हुआ हो.
कुछ तो खो जाता है जो बेचैन रखता है. मर्ज़ी का मालिक कौन है और कितना है. यह न तब तय हुआ था न अब तय होगा.
हर किसी का अपना अवलोकन है और अपनी कल्पना.
हर किसी की अपनी पीड़ा भी है.
हिस्सा तो बनना पड़ता है न.
आसमान आकाश गंगा से सुसज्जित नज़र आता है.
कोई वहां पहुंचे तो देखे कि आसमान ख़ाली है. आकाशगंगा तो कोई और ही रौशनी बनाती है. किसी और ही माध्यम से गुज़र कर.
सुंदरता कम से कम एक भेद की मोहताज होती है. पहुँच से थोड़ी सी दूरी मांगती है.
कभी किसी खूबसूरत चेहरे को बहुत ही क़रीब से देखा है ?
नहीं नज़र आता न ?
हाँ जहाँ नज़र दम तोड़ती है वहां सामीप्य स्पर्श में ढलती है।
बू बास में रच कर बिखरती है।
नज़दीकियाँ घुलने की दावत हो सकती हैं, लेकिन आकर्षण और सुंदरता का सम्प्रेषण और पंचांग बहरहाल फैसले का मोहताज होता है. इसलिए समझ लो कि आकाशगंगा दूर ही से देखने की चीज़ है. चकित होने के लिए.”
मेरी बातों ने शायद उसे और भी दुखी कर दिया था.
अब जो बोली तो उसकी आवाज़ में थकावट अधिक थी.
“बस यही बातें करने आये हो. इतनी मुसीबत उठा कर , इतनी दूर से ?”
मेरी बात अभी पूरी नहीं हुई थी. मैंने फिर बात शुरू की.
“तुम अपने अहंकार में एक दूसरे को सांस लेने की जगह देने को भी तैयार नहीं थीं और नाक और मुंह बंद करके तमाशा भी देखती थीं.
कभी लगता तुम उस सिद्धांत की अनुयायी हो कि इंसान फ़ितरत से पीडा पसंद है.
कभी पीड़ा झेल कर मज़ा लेता है कभी पीड़ा पंहुचा कर.
मुझे रक्षात्मक हालत में पंहुचा कर किस प्रकार के मज़े लेती थीं.
लम्बे , फैले प्राचीन पेड़ों पर परिंदे अब सुस्ता रहे थे. उनकी आवाज़ों में चहकार नहीं थी. एक सरगोशी सी सिसकारी थी.
जाने क्यों परिंदे बहुत दुखी और मातमी लग रहे थे. सब कुछ यथार्थ से हट कर लग रहा था.
मातमी सा.
जैसे कोई रोमांटिक फिल्म आहिस्ता आहिस्ता चल रही हो.
मैंने एक गहरी ठंडी सांस ली.
वातावरण दुःख से भर गया.
यह समय था कि मैं विषय बदलूँ.
“बातें तो सदियों में ख़त्म न हों.
तुम्हारे अनुसार जब कोई बात अंतिम बात होती ही नहीं तो बातें ख़त्म भी कैसे हों?
चलो लगे हाथ अंततः यह फैसला भी कर लें कि कसूर किस का था?
वह थोड़ा चौंकी और बोली –
“वाह साहेब ! अगर यह फैसला आसान होता तो हो चुका होता।
आम बात यह है कि तुम्हारा.
लेकिन जवाब में तुम कहोगे कि नहीं, तुम्हारा.
एक और बहस , एक और लड़ाई.
तो जान छुड़ाने को या खुद को त्याग की देवी साबित करने के लिए कहती हूँ कि मेरा.
तो बात समाप्त हो गई क्या ?
एक और भी समाधान है।
एक तीसरा और आसान रास्ता.
तक़दीर का.
तो क्या तुम संतुष्ट हो गए ?
अब बोलो कोई चौथा रास्ता है ?
चलो मान लेते है भई समाज का , दुनिया का , सबका.
अब बोलो तुम्हारी अंतिम बात समाप्त हुई?
बातों के तुम शौक़ीन हो सदा के.
सदियाँ गुज़री बातों में.
वह देखो कौन आया है तुम्हे लेने.

झाड़ झंकार हटाते , बचते बचाते , लम्बी स्वयं ही उगी घास को रौंदते हुए मुझ तक आ पहुंचा.
“बाबू जी ! बा जी कह रही हैं, मैं थक गई हूँ टैक्सी में बैठे बैठे. जहाज़ का वक़्त निकला जा रहा है.
फातेहा पढ़ ली है तो अब आ जाएँ.”

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Javed Anwar is a trustworthy name in the story of the adept of the time. These stories of the stories of “Nạrsạỷ” are present.

Beyond access
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Story: beyond reach
Novelist: Javed Anwar, Pakistan
Translation: Sadaf Iqbal, MK’s bajaj
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My heavy shoes were unfamiliar with the rebel sounds of spring dry leaves, and they were going to trample them. It was in my condition that the sun was happy before drowning on the orange horizon.
When I was yellow, he dragged himself into the grass and pulling himself into the puddle.
The Moon was ignited by the moon of Black Silk Swirls.
The sadness put all around him and the atmosphere was sad.
Same Square Bench there, down under the dense tree.
It was a surprise.
Neither she nor she was attracted to me.
It was impossible that he did not feel mine. She always used to recognize me without seeing it. I came when I call him. He was arrested in the love of his love, in the magic, as soon as he had come to this magic. Then this pride, it’s non-Regularity and neglect?
There was no living soul in this spread creepy forest. Only we were two and the deep silence showing the endless spread.
Such a silence that was capable of absorbing us into themselves.
The Universe is paused, time is silent. The sky is bowed, attracted, time and the world is bē’āvāza and surprised.
Deep and deep, serious silence.
My existence was unimportant and insignificant in that default canvas or perhaps it was unknown.
Drowning in the future of your thinking.
Your own existence is jūjhatī.
Then after a time there was a wave of silence. Singing the atmosphere.
” finally you have reached here?”
He said without seeing me.
He found out that I had wandered on to the planet, the prisoner of the centuries. He sat down on a square bench with him. Just like we used to sit.
For a long time we both remain silent.
The Shadows of the trees were long in the evening in the evening.
” it’s not a Lawrence Garden, where we had made a white sheet of January and the sunshine of January, the strange voice knocked on my ears.
” remember you, our heads were touching. Your things used to tickle in my ear. You were going to speak. Sometimes poetry is sometimes poetry. What was the music in your talks?
Slow and clear words, from which way you used to slip from your carved lips.
What were you singing?
He made all these things in a colourless, cold and flat style.
Like a robot.
The text, pattern and expression of the conversation were different from each other.
And that night will also remember.
How fast it was raining out. The strong air was sometimes realised by the doors and the windows and felt the presence of his presence.
At the last noon of the night.
And you listened to all of your poems. My heart felt a push.
He landed in my soul straight into the window of my memories.
What do I answer?
I’m a prisoner of thoughts.
I don’t remember what was in the senses.
Completely in his prison, he was in reach. I felt helplessness. My eyes got wet.
It was a strong wish that she should get him from the chest. Very loud.
With so much force that he merges into me and we turn into a existence.
The one who made a existence is his or mine, it was not very important to me.
There is only one body in both of us.
An interval of silence came.
Then I heard my voice.
” what you used to say that love is crying. I thought of you a lot later.
It was confession. Perhaps the expression of too late.
I wanted to say anything else but his mysterious seriously took away my guts.
” where are you coming?”
” after so many centuries. ”
His lukewarm voice was rattled.
He was giving effect from the sound of specific “na” to speak. I felt bad in his voice, sadness and complaint.
My heart was cut off.
” I’M searching for my question and a quarter of the world. Thousand years. Millions of miles. Beyond every number.
You had told me to come to me.
I have come to sleep now. Follow your orders.
The Prisoner of your love.”

There was no difference in his neglect.
She was lost somewhere else and started speaking in a rustling after an interval.
” so where was I?
I haven’t gone anywhere.
I said where I had to go?
Always and after every fight,
When you regretted, and then lost my desire to find me, they went out to celebrate. Embarrassed.
So what did I say?
That’s not where I have to go? You could never speak a lie. Not anywhere. Here you are hovering around you.”
I felt that my eyes are full of tears.
It is not right to be a man of such a liquid as a man. But everything is just a little in his bus.
His words were, however, opened many doors of hope.
I had to speak to myself.
” then where did you go?
Why was it?
What will I do without thinking?
Why did you so helpless?
Even after knowing this, life will be worse than death.
If I did not come here, I would have wandered for centuries. Stray. No destination.”

Some of his acts, with a signal, did not realize that he was a little melted. Pasījī.
A Cardiologist. Automatic, mechanical style. She was all going to talk positive and listening to my condolence song. I wonder how the words and sentences are unaffected by this delicate personality?
I heard his voice after a heavy gap.
” you will remember our last thing?”
I got a little bit of scared and thought.
Then he sought his help.
” What’s the last thing?
What is the last thing, if it is a matter of heart?”
He turned to me for the first time.
He was taking a strange peace in his eyes. Body and organ organs are filled with fun and fill. And the eyes are under the same emotions.
The Flame of sad identity emerged, but the whole sense of attitude and indifference emerged.
The words were stuck in my neck.
A little stop, I collected the courage and then spoke.
” forgive me. I could not understand your philosophy, now what would you understand?”
He then put his eyes on the horizon, and said slowly.
” if you really want to understand, I can help?
What do you say? What do you understand?
The condolence song of the desires of blood?
Tenants of broken dreams?
Scattered dreams?
Do not start cheap words for God.”
I felt that my romantic sadness shone safe in the dark corners of her brain.
On the eve of the evening, the herd of birds were flying towards the tall trees.
In his desire, he felt more anxiety than expected. The Bird’s flight was also dull.
” well tell me today that she was love?”
I started talking in war and then began to speak.
It was a question of many times.
So far from the thirst of an answer.
“oops”
She just said that.
I asked again,
” that’s good.
The Library was tight between the big shelves filled with books, in the light of darkness when I had put hands on your shoulder for the first time. A Kampakapī Sea was passed away from my palm with a transparent, transparent body.
Every hole was pierced. There was a windows.
Open the meaning of that virgin vibration.”
I saw my neck by rotating the neck lightly, and looked at me.
” you are still stuck in the same romance I was not gonna change the topic.
” the vibrations, the fragrant, the holy cupcakes spread your body. My body felt it. I was wet in that woman.
He had a target. Not Genesis. ”
I became a completely question. As soon as the answer was, my release was dependent. But the answer was only to him if he wanted.
Spoken in the filled voice –
” no answer.
Have you ever responded to such questions?
Is that the magical moment in your life, which does not forget to forget?”
I didn’t have any scruples looking for answers.
You don’t need to think like that. The answer is standing in front.
” Oh, no. The most satisfaction, the magical moment, when you became sick of that night, I fell asleep in my chest and fell asleep.
So cool, that light was snoring.
When you don’t snore.
I’ve slept a little.
I was so mad.
Satisfied
Supergluing to the eyes of the eyes, the intoxication of your heart is cool. Your satisfaction was entering my veins and I’m pissed.
I’m just watching you until you wake up.”
I thought that this thing shook him too. As he has also been looking for this common moment. Which is the capital of life.
Then graceful and boli –
” just do it. Let memories keep memories.
Some of these helpless moments gave some money to life. Otherwise I know you.
Cold and satisfied. Selfless. Tell yourself.
What are you looking for? It wasn’t your destiny to achieve me.
What’s missing? What’s lost?
They were filled. Everything is available.
Then why was the beggar?
Why do you become beggar? Adrift, so far. What do you want to prince?
What has been missing? The owner of the choice!”

Finally, his favorite subject broke.
While speaking on this subject, time was always included with love in his accent.
I had the answer.
It was so clear that probably never happened before.
Something is lost who keeps restless. Who is the owner of the choice and how much it is. It was neither decided, nor will it be decided.
Everyone has its own observation and your imagination.
Everyone has their own pain.
It has to be a part.
The sky is decorated with the ganges.
If someone arrived there, then see that the sky is empty. The Milky way makes someone else light. Pass through someone else.
Beauty is at least one secret. Require a little distance from reach.
Have you ever seen a beautiful face very close?
Don’t you see?
Yes, where the eye breaks, there is kindness in touch.
The boo makes it scatter in the bus.
There may be a party of nazadīkiyām̐, but the communication and beauty of the beauty and the calendar is the poor. So understand that the milky way is to look away from the galaxy. To be amazed.”
My words might have made him more sad.
Now the voice said that there was more exhaustion in his voice.
” that’s what you have to do. Raise so much trouble, so far?”
My word wasn’t completed yet. I started talking again.
” you were not even ready to breathe each other in your ego, and to see the spectacle by closing the nose and mouth.
Sometimes you follow the decision that man likes a habit of nature.
Sometimes you have fun by facing pain, never get hurt.
What kind of fun did I get in the defensive condition.
The birds were well-rounded on the long-spread ancient trees. There was no cahakāra in their voices. There was a murmur.
Know why the birds were very sad and sad. Everything was real hot.
Sad sa.
Like a romantic film moving slowly.
I took a deep cold breath.
The atmosphere was filled with sorrow.
It was the time I change the subject.
” things don’t end in centuries.
How do you think it’s not the last thing to be done?
Come on, let’s decide what the fault was.
He was a little cauṅkī and said –
” wow, sir! If the decision was easy, it would have been done.
That’s yours.
But in the answer you will say, not yours.
Another debate, one more fight.
So I ask you to get rid of it or to prove the goddess of sacrifice.
So, what’s the matter?
There’s another solution.
A third and easy way.
Fate.
So are you satisfied?
Now say there is a fourth way?
Let’s accept brother of society, everyone of the world, everyone.
Now say your last thing ended?
The things you are fond of, always.
Things passed away.
Look who has come to take you.

Remove the shrubs, avoid saving it, the long self-overgrown grass came to me.
” Daddy ji! BA g saying I’m tired sitting in the taxi. The Ship’s time is being turned out.
If you have read fateha, come now.”

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